मंदिरों में प्लास्टिक पर प्रहार, अब आस्था भी होगी ‘ग्रीन’!

घंटी बजती है। भीड़ उमड़ती है। प्रसाद मिलता है। और पीछे छूट जाता है… प्लास्टिक का पहाड़। क्या यही हमारी आस्था की पहचान है? अब तस्वीर बदलने की कोशिश शुरू हो गई है।

टैम्पल कनेक्ट ने ब्ल्यूप्रिंट वाटर के साथ हाथ मिलाया है। मिशन साफ है; मंदिरों और तीर्थस्थलों से एकल-उपयोग प्लास्टिक बोतलों को धीरे-धीरे बाहर का रास्ता दिखाना। आसान नहीं है। लेकिन जरूरी है।

भारत के मंदिर सिर्फ पूजा के स्थल नहीं, भीड़ के महासागर हैं। रोज़ लाखों लोग आते हैं। पानी पीते हैं। बोतल फेंकते हैं। और देखते ही देखते पवित्र परिसर कूड़ाघर में बदलने लगता है।

आस्था पवित्र… लेकिन आसपास गंदगी। यह विरोधाभास अब चुभने लगा है। यहीं से इस पहल की शुरुआत होती है।

अब प्लास्टिक की जगह आएगी कागज आधारित, रिसाइकिल होने वाली पैकेजिंग। हल्की। सुविधाजनक। और सबसे बड़ी बात, धरती पर बोझ कम डालने वाली।

ब्ल्यूप्रिंट वाटर का दावा है कि यह व्यवस्था मंदिरों की रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर बड़े मेलों की भारी भीड़ तक आसानी से लागू हो सकती है। मतलब, न श्रद्धालु परेशान होंगे, न व्यवस्था चरमराएगी। पर असली लड़ाई सिर्फ बोतल बदलने की नहीं है। आदत बदलने की है।

इसीलिए ‘इको-हीरो’ अभियान भी साथ चलाया जाएगा। संदेश सीधा है कि अपनी बोतल साथ लाओ, जिम्मेदारी निभाओ। सवाल उठता है कि क्या श्रद्धालु सुनेंगे?

शायद हां। क्योंकि जब बात धर्म की हो, तो असर गहरा होता है। गिरीश वासुदेव कुलकर्णी कहते हैं, धर्म सिर्फ पूजा नहीं सिखाता, जिम्मेदारी भी सिखाता है। और अगर मंदिर खुद उदाहरण बन जाएं, तो समाज को बदलने में देर नहीं लगती।

दूसरी तरफ, अनुज शाह इसे एक बड़े अवसर के रूप में देखते हैं। उनके शब्दों में, मंदिर देश के सबसे बड़े उपभोग केंद्र हैं। यहां छोटा बदलाव भी बड़ा असर पैदा कर सकता है।

बात में दम है। अगर हर श्रद्धालु एक प्लास्टिक बोतल कम इस्तेमाल करे, तो सोचिए… हर दिन कितना कचरा कम होगा।

यह पहल धीरे-धीरे लागू होगी। पहले चुनिंदा मंदिर। फिर बड़े आयोजन। और फिर शायद पूरा देश। लक्ष्य बड़ा है, धार्मिक स्थलों पर ‘ग्रीन वाटर’ को नया सामान्य बनाना।

आस्था अब सिर्फ सिर झुकाने तक सीमित नहीं रहेगी। आस्था अब जिम्मेदारी भी निभाएगी। और शायद पहली बार… मंदिरों में पूजा के साथ-साथ प्रकृति भी मुस्कुराएगी।