आम आदमी का दर्द और उससे जुड़े अदब की रूह आज भी उन आवाज़ों में ज़िंदा है जो सीधे दिल से बात करती हैं। नज़ीर अकबराबादी और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ऐसे ही शायर-कवि हैं, जो सदियों बाद भी लोगों के ज़हन और दिल में सांस लेते हैं। वे भारत की साझा साहित्यिक विरासत की रौनक और जान हैं।
पिछले दिनों, आम आदमी के शायर नज़ीर अकबराबादी की जयंती आगरा के ताजगंज स्थित शेरोज़ हैंगआउट में आयोजित निराला-नज़ीर कार्यक्रम में पूरे जोश और मोहब्बत के साथ मनाई गई। इस मौके पर शायरी और साहित्य से जुड़े लोग जमा हुए और न सिर्फ नज़ीर, बल्कि राष्ट्रकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी उनके अलग-अलग अंदाज़ में याद किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, आगरा के पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में नज़ीर को आगरा की सांस्कृतिक पहचान बताया। उन्होंने कहा कि नज़ीर की नज़्में और ग़ज़लें आज भी दुनिया भर में पढ़ी-सुनी जाती हैं। नज़ीर ने उर्दू शायरी में नज़्म को एक मज़बूत और लोकप्रिय पहचान दी। उन्होंने निराला से तुलना करते हुए कहा कि भले ही निराला छायावाद के बड़े स्तंभ थे, लेकिन उनकी कविता की धड़कन आम आदमी ही रहा। दोनों रचनाकारों ने साहित्य को दरबारों से निकाल कर गलियों और घरों तक पहुंचाया।
नज़ीर अकबराबादी का असली नाम वली मुहम्मद था। उनका जन्म 1735 में दिल्ली में हुआ, जब मुगल सल्तनत ढलान पर थी। बाद में वह अकबराबाद यानी आज के आगरा में बस गए और 1830 में लगभग 95 वर्ष की उम्र में यहीं उनका इंतकाल हुआ। उनके वालिद मुहम्मद फारूक थे और उनकी वालिदा आगरा किले के सूबेदार नवाब सुल्तान खान की बेटी थीं। नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के हमलों जैसे अशांत दौर ने उनके जीवन और सोच को गहराई से प्रभावित किया। इसी वजह से उनकी शायरी में आम इंसान के दर्द और संघर्ष की सच्ची तस्वीर मिलती है।
मीर और ग़ालिब जैसे दरबारी शायरों से अलग, नज़ीर ने खुद को आम लोगों का शायर चुना। उन्होंने आसान, बोलचाल की ज़बान अपनाई, बाज़ारों, मेलों और गलियों की ज़बान। होली-दीवाली, पतंगबाज़ी, नाच-गाना, बाज़ार, हिंदू-मुस्लिम एकता, सब उनकी शायरी में जिंदा हो उठते हैं। फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और देसी बोलियों के अल्फ़ाज़ को उन्होंने इस तरह मिलाया कि कविता आम आदमी की अपनी बन गई।
नज़ीर को यूं ही ‘नज़्म का जनक’ नहीं कहा जाता। उन्होंने ग़ज़ल की सीमाओं से आगे जाकर कहानी कहने वाली शायरी को मज़बूती दी। कहा जाता है कि उन्होंने करीब दो लाख शेर लिखे, हालांकि आज करीब छह हज़ार ही उपलब्ध हैं। उनकी मशहूर नज़्म ‘बंजारानामा’ का शेर “सब ठाठ पड़ा रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा”आज भी ज़िंदगी की अस्थिरता का सबसे सादा और गहरा सच कहता है। ‘आदमी नामा’ और त्योहारों पर लिखी नज़्में हमारी साझा संस्कृति की तस्वीर पेश करती हैं।
‘आगरा बाज़ार’ पर आधारित उनकी कविता ने रंगकर्मी हबीब तनवीर के मंचन के ज़रिए नई पीढ़ी को भी नज़ीर से जोड़ा। आज भी आगरा में उनकी सादा क़ब्र पर चिराग़ जलते हैं और लोग उस शायर को याद करते हैं जिसने आम इंसान की ज़िंदगी को शायरी बना दिया।
संगीत प्रस्तुति के बाद मशहूर गायक सुधीर नारायण ने अपने दिली ताल्लुक़ का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि देश-विदेश में व्यस्त कार्यक्रमों के बावजूद वह बसंत के मौसम में आगरा आकर नज़ीर को याद करना नहीं भूलते, जैसे फ़िज़ा खुद इसमें उनका साथ देती हो।
कार्यक्रम में एक अहम प्रस्ताव भी रखा गया, ताज महल मेट्रो स्टेशन या मालका गली के पास किसी स्टेशन का नाम नज़ीर अकबराबादी के नाम पर रखा जाए। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ और सरकार को भेजा जाएगा।
अमृता विद्या – एजुकेशन फॉर इमॉर्टैलिटी सोसायटी की ओर से नज़ीर पर बनने वाली बहुभाषी फ़िल्म का प्रोमो भी दिखाया गया। संस्था के सचिव अनिल शर्मा ने बताया कि फ़िल्म की शूटिंग जल्द शुरू होगी, ताकि नज़ीर का पैग़ाम दुनिया भर तक पहुंचे।
अनिल शर्मा ने कहा कि नज़ीर ने ज़िंदगी की सच्चाइयों को बेख़ौफ़ लिखा और लोगों में हौसला और उम्मीद भरी। शेरोज़ हैंगआउट भी इसी सकारात्मक सोच का प्रतीक है। कार्यक्रम में एसिड अटैक सर्वाइवर्स की मौजूदगी ने इसे और अर्थपूर्ण बना दिया, जिनसे सभी ने खुलकर बातचीत की।
जब शायरी अमीरों और दरबारों तक सीमित थी, तब नज़ीर ने आम आदमी की आवाज़ बनना चुना। आज भी उनकी सादी लेकिन असरदार पंक्तियां याद दिलाती हैं कि सच्ची अमरता वही पाता है जो लोगों के लिए और लोगों से बात करता है। ऐसे आयोजनों के ज़रिए नज़ीर और निराला की रिवायत आने वाली नस्लों तक यूं ही ज़िंदा रहेगी।

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