गोष्ठी में कवि शलभ भारती ने काव्य-पाठ करते हुए जीवन में आगे बढ़ने का संदेश दिया। "मन का सागर-मंथन करले, पीले फिर तीक्ष्ण गरल खारा। बन जा, विषपायी नीलकण्ठ, हंस कर जीवन जी ले सारा। अन्त में मिलेगा अमृत-घट, निर्मल-निर्मल, प्यारा-प्यारा। गा गीत अनोखा, बन जोगी, लेकर हाथों में इकतारा।
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