हरित क्षेत्रों की रक्षा के लिए मैसूर के नागरिकों ने कसी कमर

मैसूर : मैसूर के पार्कों को बचाने की लड़ाई अब याचिकाओं से निकलकर सड़कों तक पहुंच गई है। बीते रविवार को चेलुवम्बा पार्क में सैकड़ों नागरिकों, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जुटकर साफ संदेश दिया कि वे शहर के हरित फेफड़ों को कंक्रीट के हवाले नहीं होने देंगे।

मैसूर ग्राहक परिषद के नेतृत्व में विभिन्न नागरिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पार्क के चारों ओर तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया और मौन मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों ने कर्नाटक सरकार पार्क (संरक्षण) अधिनियम, 1975 में किए गए उस संशोधन को वापस लेने की मांग की, जिसमें पार्क की पांच प्रतिशत तक जमीन को सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के लिए दूसरे काम में इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है।

विधानसभा ने 24 अगस्त को इस प्रावधान को मंजूरी दी थी। देखने में पांच प्रतिशत जमीन का प्रावधान छोटा लग सकता है, लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं के मुताबिक यह एक खतरनाक दरवाजा खोल सकता है।

एमजीपी नेताओं ने चेतावनी दी, “आज पांच प्रतिशत की छूट है, कल इसी बहाने स्थायी कंक्रीट खड़ा हो सकता है।” उन्होंने याद दिलाया कि चेलुवम्बा पार्क में पहले एक नगरपालिका ढांचा खड़ा किया गया था, जिसे कानूनी कार्रवाई के बाद हटाना पड़ा था।

प्रदर्शनकारियों ने शहर में पार्क की जमीन पर पानी की टंकियां, पुस्तकालय और अन्य सुविधाएं बनाने के प्रयासों का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि पार्क जनता की साझा संपत्ति हैं, जिन्हें किसी भी परियोजना के लिए आसानी से नहीं छीना जा सकता।

एमजीपी ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से विधेयक को मंजूरी न देने की अपील की है। विरासत विशेषज्ञों ने कहा कि मैसूर के पार्क केवल घूमने और मनोरंजन की जगहें नहीं हैं। वे शहर के फेफड़े हैं, जो जैव विविधता बचाने के साथ-साथ शहर की जलवायु को रहने लायक बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।

प्रदर्शन में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी रही। पूर्व सांसद प्रताप सिम्हा, भाजपा नेताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी ने संकेत दिया कि पार्क बचाने की यह मुहिम व्यापक नागरिक मुद्दा बन चुकी है। बेंगलुरु में चार सांसदों ने विरोध प्रदर्शन में भाग लिया।

आयोजकों ने चेताया कि एक बार हरित क्षेत्र सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए दे दिए गए तो उन्हें वापस हासिल करना लगभग नामुमकिन होगा। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए पार्कों के बजाय वैकल्पिक जमीन तलाश की जाए।

मैसूर की यह आवाज पूरे कर्नाटक में सुनाई दे रही है। बेंगलुरु में भी नागरिकों ने लालबाग में मानव श्रृंखला बनाकर इसी प्रावधान का विरोध किया।

संदेश बिल्कुल साफ है कि विकास का स्वागत है, लेकिन शहर की बची-खुची सांस लेने की जगहों की कीमत पर नहीं।




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