सड़क का एक गड्ढा किसी परिवार की खुशियां छीन सकता है। इसके बावजूद सड़कें टूटती हैं, मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और हादसों के बाद जवाबदेही अक्सर तय नहीं होती है। अब इस गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में मुआवजे और जिम्मेदारी तय करने की मांग उठी है।
आगरा के अधिवक्ता और सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन ने 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपने आवेदन का उल्लेख किया। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने मामले को 25 नवंबर को दोपहर दो बजे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। जैन ने सड़क दुर्घटनाओं में गड्ढों की भूमिका को देखते हुए पीड़ितों को मुआवजा देने, सड़क निर्माण से पहले जलनिकासी सुनिश्चित करने और ठेकेदारों व संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। उन्होंने सड़क की घोषित उम्र, मरम्मत की गारंटी और सरकारी खर्च का विवरण आम लोगों को ऑनलाइन उपलब्ध कराने के सुझाव भी दिए हैं।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2023 में देशभर में सड़क के गड्ढों से संबंधित 5,840 दुर्घटनाएं हुईं। इनमें 2,161 लोगों की मौत हुई और 5,309 लोग घायल हुए। वर्ष 2024 में ऐसी दुर्घटनाओं की संख्या घटकर 5,432 रह गई। लेकिन, मौतों का आंकड़ा बढ़कर 2,385 हो गया। इस दौरान 4,643 लोग घायल हुए। दोनों वर्षों में कुल 11,272 दुर्घटनाओं में 4,546 लोगों की जान गई और 9,952 लोग घायल हुए।
इस तरह दुर्घटनाओं की संख्या घटने के बावजूद 2024 में गड्ढों से होने वाली मौतें पिछले वर्ष की तुलना में 224 अधिक रहीं। जैन के अनुसार, ये आंकड़े सड़क रखरखाव में सुधार और जवाबदेही तय करने की जरूरत रेखांकित करते हैं।
उत्तर प्रदेश में बारिश के बाद विभिन्न विभागों की 65,093 किलोमीटर सड़कें खराब पाई गईं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें से 12,228 किलोमीटर सड़कों पर गड्ढे भरने का काम किया गया था।लोक निर्माण विभाग की 47,019 किलोमीटर खराब सड़कों में से 9,941 किलोमीटर पर मरम्मत की जानकारी दी गई। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रदेश में बारिश के बाद गड्ढे भरने पर हर साल लगभग 250 से 300 करोड़ रुपये खर्च होते हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भी सड़क रखरखाव पर भारी रकम खर्च की जाती है। संसद में दिए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार, संबंधित राष्ट्रीय राजमार्ग खंडों के रखरखाव और मरम्मत पर वर्ष 2023-24 में 6,523 करोड़ रुपये और 2024-25 में 9,488 करोड़ रुपये खर्च हुए। जैन का कहना है कि बार-बार सड़क टूटने के कारणों की पहचान और स्थायी समाधान से सार्वजनिक धन की बचत हो सकती है। इससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी कम किया जा सकता है।
आवेदन में मांग की गई है कि जांच में सड़क का गड्ढा, खुला मैनहोल, खुली नाली या सड़क की कोई अन्य गंभीर खराबी दुर्घटना का कारण पाए जाने पर जिम्मेदार विभाग या संस्था छह महीने के भीतर पीड़ित को मुआवजा दे।
प्रस्ताव के अनुसार, सड़क दुर्घटना में मृत्यु होने पर पांच लाख रुपये, स्थायी दिव्यांगता होने पर उसकी गंभीरता के अनुसार 50 हजार से पांच लाख रुपये, स्थायी दिव्यांगता के बिना चोट लगने पर 50 हजार रुपये और मामूली चोट पर 25 हजार रुपये दिए जाने चाहिए।
मुआवजा नहीं मिलने या दुर्घटना के कारण पर विवाद होने की स्थिति में पीड़ित परिवार को मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में जाने का विकल्प भी उपलब्ध कराने की मांग की गई है। आवेदन में 20 जुलाई 2018 या उसके बाद हुई ऐसी दुर्घटनाओं को प्रस्तावित व्यवस्था के दायरे में लाने का आग्रह है। ये मुआवजा राशि और समयसीमा जैन के प्रस्ताव का हिस्सा हैं। इन्हें मौजूदा कानूनी रूप से स्वीकृत मुआवजा व्यवस्था नहीं माना जाना चाहिए।
जैन ने कहा कि सड़क निर्माण में जलनिकासी की अनदेखी गंभीर समस्या पैदा करती है। पानी जमा होने से सड़क की सतह और उसकी निचली परतें कमजोर हो सकती हैं। नतीजतन, बारिश के बाद गड्ढे बनने और सड़क टूटने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने भारतीय सड़क कांग्रेस के विभिन्न मानकों का हवाला देते हुए कहा कि सड़क की मजबूती और उपयोगिता के लिए पर्याप्त जलनिकासी जरूरी है। इन मानकों में सड़क की ढाल, नालियों, पुलियों और पानी के अंतिम निकास की व्यवस्था से जुड़े प्रावधान हैं। उनका सुझाव है कि नई सड़क बनाने, चौड़ी करने, मजबूत करने या दोबारा डामर बिछाने से पहले सक्षम अभियंता जलनिकासी प्रमाणपत्र जारी करे। इसमें स्पष्ट हो कि पानी निकालने की पर्याप्त व्यवस्था पहले से मौजूद है या उसके निर्माण की योजना, बजट और समयसीमा स्वीकृत है। उनके अनुसार, केवल नाली बना देना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नाली चालू हो और पानी सुरक्षित स्थान तक पहुंच सके। सड़क और नाली अलग-अलग विभागों के अधीन होने पर उनकी जिम्मेदारी भी पहले तय की जानी चाहिए।
सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक सड़क निर्माण और मरम्मत के ठेके में सड़क की अपेक्षित उपयोगी उम्र और ठेकेदार की गारंटी अवधि अलग-अलग दर्ज हो। इससे लोगों को पता चल सकेगा कि सड़क कितने समय तक चलनी चाहिए और खराबी आने पर ठेकेदार कब तक उसे अपने खर्च पर ठीक करने के लिए जिम्मेदार है।
यदि सड़क तय अवधि से पहले खराब हो जाती है, तो उसकी गुणवत्ता, इस्तेमाल की गई सामग्री और रखरखाव की जांच होनी चाहिए। जांच के बाद जिम्मेदार ठेकेदार, सलाहकार, अधिकारी या संस्था की जवाबदेही तय की जाए। उन्होंने यह भी प्रस्ताव दिया कि सड़क का अंतिम भुगतान और काम पूरा होने का प्रमाणपत्र जलनिकासी व्यवस्था की जांच के बाद ही जारी किया जाए। हालांकि, तत्काल खतरा पैदा करने वाले गड्ढों की मरम्मत, बैरिकेड लगाने और चेतावनी संकेत लगाने जैसे आपात कदम बिना देरी किए जाने चाहिए।
सड़क निर्माण में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए जैन ने गूगल मानचित्र से जुड़ा सार्वजनिक डिजिटल नक्शा बनाने का सुझाव दिया है। इसमें प्रत्येक सड़क और उसके निर्माण या मरम्मत कार्य को अलग पहचान दी जाए।
नागरिक मोबाइल पर सड़क के संबंधित हिस्से को छूकर स्वीकृत बजट, ठेके की रकम, वास्तविक खर्च, ठेकेदार और अभियंता का नाम, काम शुरू होने और पूरा होने की तारीख तथा गुणवत्ता जांच का विवरण देख सकें।
इसमें जलनिकासी प्रमाणपत्र, सड़क की घोषित उम्र, गारंटी अवधि, पिछली मरम्मत और संबंधित दस्तावेज भी उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। जैन के अनुसार, इससे जनता के पैसे से हुए काम का हिसाब आम नागरिकों की पहुंच में आ सकेगा। उन्होंने गड्ढों और जलभराव की शिकायत के लिए वेबसाइट, टोल-फ्री नंबर, व्हाट्सऐप और लिखित आवेदन जैसे माध्यम उपलब्ध कराने की भी मांग की है। हर शिकायत को एक नंबर दिया जाए और कार्रवाई की स्थिति ऑनलाइन दिखाई जाए। मरम्मत पूरी होने पर उसकी तस्वीर भी उपलब्ध कराई जाए।
जैन ने सड़क सुरक्षा से जुड़े सुझावों पर अमल के लिए समयबद्ध व्यवस्था बनाने की मांग की है। उनके प्रस्ताव के अनुसार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय राज्यों के साथ मिलकर 60 दिनों में प्रमाणपत्र, सड़क की उपयोगी उम्र और निगरानी की साझा व्यवस्था का प्रारूप तैयार करे।
राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से 90 दिनों में शुरुआती अनुपालन रिपोर्ट मांगी जाए। इसके बाद हर तीन महीने में प्रगति सार्वजनिक की जाए। उन्होंने नालियों की सफाई, गड्ढे भरने और एक ही सड़क पर बार-बार मरम्मत के खर्च का अलग-अलग हिसाब रखने का सुझाव भी दिया है। इससे अनावश्यक खर्च और बार-बार होने वाली मरम्मत के कारणों की पहचान में मदद मिल सकती है।
जैन ने कहा, “मेरी चिंता उन परिवारों की है जिनका कोई अपना सड़क के गड्ढे के कारण घर वापस नहीं लौटता या घायल होकर लंबे समय तक तकलीफ झेलता है। सुरक्षित सड़क और समय पर मरम्मत हर नागरिक की जरूरत है।” उन्होंने कहा कि सड़क बनाने से पहले पानी की निकासी सुनिश्चित होनी चाहिए। सड़क कितने साल चलेगी, यह बताया जाना चाहिए और जनता को हर काम का पूरा हिसाब मिलना चाहिए। जहां लापरवाही साबित हो, वहां जिम्मेदारी तय हो और पीड़ित परिवार को मुआवजे के लिए भटकना न पड़े।

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